प्यासी रूह
राम कबीरा साजन मेरा चरणँ कमल महं पावन डेरा!
फ़ना कीजिए जग की ममता जिसमें ये मन पापी रमता!
चलकर सत्यलोक से आए पूरणँ इल्म जगत ले आए!
लालन पालन जाति जुलाहे राम नाम की लगन लुभाये!
रामा नँन्द गुरू अपनाए कबिरा उनके शिष्य कहाए!
पंचतत्व में पिंजर दाख़िल होइ कबीरा दिल में क़ाहिल!
दास कबीर विरासत पकरी चौंसठ लाख शिष्य की गठरी!
करता ज्ञान दिलों पे दस्तक़ पावन दिल सबके हैं मस्तक़!
भटके सजनी रूह पियासी बुझे प्यास नाँ लख चौरासी!
होइ मिलन पूरणँ तब मेरा सजनी लेइ सजन सँग फ़ेरा!
बिन पिय दिल में बरहम छाई मेरे जिगर क़रार नँ आई!
तड़फ़ बग़ैर सजन के सजनी बेज़र इश्क़ ढले दिन रजनी!
मुज़रा मरसिम राह घनेरी अब दिल मेरे रही नँ शेरी!
उड़ गई निंदिया नैंन हमारी बेताबी दिन रैन तुम्हारी!
क़ायनात में परेशान हूँ करन मोहब्बत पशेमान हूँ!
बुझे प्यास तब राम मिलेंगे फ़ूल बहार तमाम ख़िलेंगे!
याद पिआ की मुझे सताती लिख करके ख़त उसे पठाती!
उजलत भेज बुलावा मोही तड़फ़े मछली जल बिन सोही!
दुल्हन बन कर जाऊँगी मैं साजन प्रेम निभाऊँगी मैं!
होइ अल्विदा जब ये डोली सखियो गीत मधुर हो बोली!
बूँद समद में जब मिल जाई फ़ूल जिगर में तब खिल पाई!
पिंजर छोड़ निकल मैं जाऊँ मिले रिहायत अमृत पाऊँ!
आय बरात बाँधने बन्धन कर सिंगार सजी है दुल्हन!
लखकर नैंना रोइ दिए हैं आपा अपना खोइ दिए हैं!
साजन के सँग जाऊँगी मैं सदाँ मुक्त हो जाऊँगी मैं!
चाहे क़हर भयंकर टूटे पीछा जन्म मरणँ से छूटे!
नेमत समद कबीर हमारा दिल का वो मेहबूब पियारा!
पिय बिन सजनी निंदिया खोई करके याद बहुत ही रोई!
सदमे दुनियाँ सहे घनेरे जिन्दा पति जब तक थे मेरे!
सुख दिल पत्नी जब फ़रमावै मन रूपी ये पति मर जावै!
बना पारखी जगत बसेरा पारख होइ मुक्ति का डेरा!
मेरे पति जिन्दा हैं जब तक नहीं रिहायत मोकू तब तक!
मरजायें फ़रहान अपारा मगन होइ दिल दारम दारा!
मर जायें पाँचों जब भैया भव से पार लगे तब नैया!
सजनी है दो बूँद पियासी नाँ जाने कब मिटै उदासी!
पूरौ कुटम मेरौ मर जावै भव से जीव तभी तर पावै!
रामपाल गुरु ज्ञान बख़ारा सच्चा रब फ़रहान नज़ारा!
गीता वेद क़ुरान खोल के गहा दिया फ़रमान बोल के!
पूरणँ मुक्ति तभी हो पावै सच्चे गुरु को जो अपनावै!
हो गुरु सच्चा मुक्ति दिखावै बन्धन से सतलोक पठावै!
सही आशियाँ बरबाला है नहीं ज़ियारत कर माला है!
रामपाल गुरु हरियाने में गूँजे परचम अफ़साने में!
करूँ बंदना गुरू चरणँ की मिले मुक्ति संसार तरणँ की!
गाँव धनाना गुरू हमारे मेरे तुम बन जाओ सहारे!
आज इनायत मुझ पे कर दो जीवन के कष्टों को क्षर दो!
काल जाल अन्धेर हटा दो गुरू मुझे सतलोक पठा दो!
और नँ कोई होइ जगत में कवियों में है नहीं भगत में!
यही दुखों को हरने वाले राह मुक्ति दिखलाने वाले!
नैंना माहीं गुरु जी बसते फ़रहाने दिन रैन उभरते!
सारनाम परचम लहराया सही इबादत इल्म बताया!
करना होइ अभी तू करले राह निजात क़दम को रखले!
सारनाम तक़नीक सीख़ ले गुरु जी से कर जोड़ भीख़ ले!
तुझको अपना शिष्य बनायें सारनाम तक़नीक सिखायें!
जन्म मरणँ मिट जाये फ़ेरा गुरू चरणँ में करले डेरा!
दिल स्नेह मज़ीद कन्त को सतसाहेब है परम सन्त को!
मरहम क़ैद निजात गहाया समद लहर से पार लगाया!
जय जय जय गुरुदेव तुम्हारी करुणामय सुधि लेउ हमारी!
लगन मोहब्बत कबहुँ नँ टूटे बेशक़ जगत भले ही छूटे!
तीर निरंजन दिल पर ताना हो मरहूम जगत में आना!
सुमिरन करले नाम कबीरा जन्म मरण मिट जाये पीरा!
आयेगी कब वो घडी़ मिलै मोइ भरतार!
छूटै झन्झट मोह से दूँ मैं तन मन जार!
मिलता मन है राम से जैसे डोर पतंग!
प्रेम दिवानी हो गई उठत हिलोर उमंग!
तू ही तू दिल में बसे बन करके महबूब!
दामन मेरा थाम ले निभे मोहब्बत ख़ूब!
राह निहार कबीर की बीत जाइ दिन रैन!
तन्हाई दिल की लगी खोइ गया सुख चैन!
सज करके दुल्हन खड़ी आये साजन राम!
ग़मे रिहायत मिल गई उपजे सुक्ख तमाम!
मेरे साजन आ गए गाए सखियाँ गीत!
माँग भरे सिन्दूर से साथ निभाए प्रीत!
तजि पिंजर सजनी चली कर सम्पन्न वजूद!
मिलन कंत मशरूर दिल हो आतिश नमरूद!
हाथ पकड़कर चल दिए मेरे मन के मीत!
भाग हमार बुलन्द हैं मिले जगत से जीत!
हरि से नाता जोड़कर मेरा दिल मशरूर!
नहीं किसी की इक़्तिजा होइ जीद भरपूर!
मन की माला फेर ले हो जन्नत में वास!
बीते सुख में जिन्दगी पूरणँ होवै आस!
बिगड़ी मेरी बन गई राम मोहब्बत जोड़!
चारों तरफ़ इनायतें दुनियाँ से मुख मोड़!
निभे ग़नीमत साथिया हो फ़रहान अजीम!
सदाँ सुखी मैं हो गई करके दिल तसलीम!
जो नेमत तू खोजता यहाँ नहीं लवलेश!
नेमत मारग दूर है पिआ महल परदेश!
ग़ुमसुम रहूँ ख़याल में बुझे नँ मेरी प्यास!
प्यासी ही मर जाऊँगी ले दिल तेरी आस!
दारमदार फ़साद हैं अलवत्ता ग़म शोक!
झूठे सुख संसार के सच्चा सुख सतलोक!
करें मसल्सल बंदग़ी किया मयस्सर ज्ञान!
सत संगी वक्ता भये सत साहिब अज्ञान!
मानवता मज़हब सही करियो सबसे मेल!
नेमत कष्ट हिक़ायतें क़ुदरत का है खेल!
रामपाल गुरुदेव हैं गुरूओं के सरदार!
पाकर गुरु दीदार मैं इख़्तिताम दरक़ार!
यूसुफ़ वाशिन्दा धनी ख़ुदा राम रहमान!
मेरा तुम्हें सलाम हो किया नुमाइश ज्ञान!
हरियाने हरि आ गये राह मुक्ति दिखलाइ!
ख़ूब सूरती ज्ञान की परचम जग लहराइ!
काल जेल आधीन हैं बह्म विष्णु महेश!
सत गुरु करले बंदग़ी पूरणँ मुक्ति हमेश!
ज्योति निरंजन जाल में आते रहे रसूल!
दुनियाँ को भड़का दिया मुरझाए हैं फ़ूल!
नहीं धर्म तक़्सीम हैं मानवता है धर्म!
भूल भुलैया नाँ पड़ो उत्तम सबसे कर्म!
नहीं ज़ियारत बन्दग़ी नहीं करूँ तश्वीह!
सतसंगी संगति करूँ बरक़त हो तश्रीह!
मुक्ति राह गुरुदेव हैं ग़ैर नहीं हजरात!
मानवता की राशि हैं नेमत की बरसात!
माणिक मोती ज्ञान के करले शीघ्र कुबूल!
होइ सुखदमय ज़िन्दग़ी जाएंगे मिट शूल!
करियो मती गुमान तू जीवन ग़र फ़रहान!
मिल जाएगा धूल में दिल का हर अरमान!
मोह जगत जबहीं मिटै रामहिं रूह समाइ!
ब्रह्मादिक क्षर वासना सब मरहूम लखाइ!
साहिब की सरक़ार में दाख़िल होइ असीर!
मुक्ति मुक़म्मल कीजियो डेरा कमल कबीर!
राह बहुत आसान है अगर मुक्ति तू पाइ!
आपा अपना खोइके गुरु चरणों में आइ!
सारनाम तक़नीक से क्षर टूटे दीवार!
शब्द स्वरूपी राम के घर बैठे दीदार!
आते आते आ गई गुरू ज्ञान की धार!
हरियाने हरि नेमतें शुकूँ शान मीनार!
वख़्शा इल्म जहान में ईलाही इरसाद!
इसे ग़वारा कीजियो प्राणी तू दिलशाद!
संखों लहर इनायतें परमेश्वर दरवार!
नेमत ही मौजूद है जाये मिट दरक़ार!
ऐसा सुख बेकार है होइ ऐस आराम!
ग़मे मयस्सर बंदगी करदे सदका राम!
पूर्णं नहीं कर बंदगी नहीं बनेगी बात!
धूल होइगी जिन्दगी बे सब्री दिन रात!
नाशवान संसार में झूँठ फ़साद उसूल!
हरियाने गुरुदेव हैं करले शाद कुबूल!
चलने को तैयार हो रहा नींद में सोइ!
डोर हयाते तोड़के जम ले जायें तोइ!
नय्या मेरी पार कर शब्द स्वरूपी राम!
पड़ी हुई है धार में मिलते दुक्ख तमाम!
आया तेरी पनाह में अनुयाई गोपाल!
दे दे मुझको आशियाँ ईलाही जो हाल!

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