राम तिलावत



समझूॅं मैं हर जाति समाना नहीं जिग़र का लुटे ख़जाना!
पावन फिज़ा जगत लहराई पूरण गुरु तक़नीक सुहाई!

 वही जुलाहे जाति क़बीरा लिखा नाम क़ुरआन ख़बीरा!
मानव ज्ञान समझ नहीं पाए दाश कबीर जगत फ़रमाए!

जाति वाद तक़रार मिटाए मानवता की राह दिखाए!
नाम अता उपदेश कराए जम के फ़न्द सभी छुड़वाए!

 छड़ी हाथ ले ग़ज़ल उभरती  सूरत मेरे जिगर उतरती!
 भक्ति हीन मूरख मैं रोगी आज मोहब्बत तुमसे होगी!

राम तिलावत दिल से दिल में हो दीदार मुझे इक पल में!
पूरण ख़लिश दिले मिट जाए सजनी रूह तुम्हें अपनाए!

 ज़िल्लत जगत ग़वारा मुझको मेरा सत साहिब है तुमको!
 तीन लोक में जिनकी चाहत राम नाम की करें ज़ियारत!

 सतगुरु अगर सीख नर पावै जन्म हमेश मरण मिट जावै!
 जगत छोड़ हरि शरण गही है दिले भक्ति की धार बही है!

 अमर पुरुष महबूब हमारा नहीं जिग़र को ग़ैर ग़वारा!
 ज्योति निरंजन ग़र भरमावै सत्य क़बीर नाम फ़रमावै!

 जगत फ़साद सभी मिट जावै नेमत तू जीवन भर पावै!
सुख के सागर दास कबीरा पल भर में मिट जाए पीरा!

 जिन पे हूॅं आषक्त जिगर से नहीं ख़ौफ़ है मुझे फ़िक़र से!
राम नाम में लगन लगी है मिलने की दिल तड़फ़ जगी है!

 शब्द स्वरूपी ग़ौहर डेरा दुल्हन उसकी सौहर मेरा!
करले सजन परम अक्षर को देय विदाई क्षर अक्षर को!

राह घनेरी हल हो जाए जीवन यार सफल हो जाए!
गीता वेद क़ुरान समझ ले भव सागर से पार उतर ले!

रूह भटकती चहुं दिस डोलै मिले नीर नहीं मारग जोवै!
ज्योति निरंजन जाल पड़ी है मान शिकस्त उदास खड़ी है!

सत्य गुरू तक़नीक सुहाई तब ज़िन्दान निकल मैं आई!
गुरू तरफ़ ग़र हिज़रत होगी पूरण दिल की हसरत होगी!

जगत फ़साद सभी बिसरा दे ऊंचा जग परचम लहरा दे!
पूरण सुख जीवन भर पाए मिले अदब जन्नत जब जाए!

रामपाल गुरुदेव मोहब्बत सभी नेस्तनाबूद मोरब्बत!
अर्पण तुमको सब कुछ मेरा अभिलाषा है निजात डेरा!


सत गुरु चरणों होइ निवासा उपजे दिल में दृढ़ विश्वासा!
सत्य नाम है मुक्ति दिलाशा संकट मोचन कबीर आशा!

सत्यलोक में प्रियतम डेरा पूरण मिलन वहीं पर मेरा!
झंझट जगत बिसार दिए हैं दिल में राम उतार लिए हैं!

तीनों देव निरन्जन डेरा पुन्य उदय हो पाप अंधेरा!
राह रिहायत जगत बख़ेरा जाति दलित परमेश्वर मेरा!

हरि के धाम महर बरसातें झलकत नूर नहीं दिन रातें!
हरियाने हरि हुआ आमना करले बन्दे मुक्ति कामना!

मूरति पूजा ईद ज़ियारत मुक्ति नहीं दिल को है राहत!
अमृत तरह ज्ञान बरसावै सत गुरु राह निजात दिखावै!

ग़ौहर भक्ति फ़राहम कीजे कई कई बार राम रस पीजे!
पौधा भक्ति अगर उग आए मन का मैल तभी धुल पाए!

मौक़ा हाथ निकल नहीं जाए ग़ुजरा वक्त लौट नहीं आए!
सत्यलोक पद अमर मिलेगा बे ग़म नेमत भंवर ख़िलेगा!

ऐसी नेमत चाह लगी है  हर दिन दिल में आह जगी है!
 ग़म से प्रेम ख़ूब दिल करले दुनियां रहके जीवित मरले!

गुरू इनायत नर नहीं पावै हरि महरूम काल कर जावै!
मज़दूरी निज पुत्र करावै मक़्तव ज्योति निरंजन खावै!

उत्तम नहीं निरन्जन छाया ममता मोह जगत भरमाया!
 सत्य गुरू ग़र शरण नं जावै ग़मे रन्ज जीवन भर पावै!
 
अरब ख़रब की दौलत जोड़े संग नं चले प्राण जब छोड़े!
 भक्ति राम अनमोल ख़जाना धन है धूल शमा परवाना!

कोठी बंगला कार निवाशी पुन्य कमाई होइ प्रकाशी!
पीछे छूट जाय सब घेरा होगा जब मरघट मह डेरा!

जीवन सुखद रूठने वाला तन से प्राण छूटने वाला!
सभी जगत दरक़ार तोड़ले प्रेम प्रभू सरक़ार जोड़ले!

पूरण सुख बैकुंठ निवाशी संत कबीर दास अविनाशी!
दिल से लगन लगाए जा तू हरी नाम गुणं गाए जा तू!

हरी मिलन की चाहत होगी करुण पुकार अदायत होगी!
दुनियां से मुख मुड़ जाएगा जन्म मरण से छुट जाएगा!

दाता मुक्ति क़बीर एक है ब्रह्मादिक क्षर नहीं शेष है!
कर फ़रियादें दिले  बंदगी मोक्ष मयस्सर जिये जिंदगी!


नींच जाति ठाकुर परदेशी ख़्वाहिश मुझको मिलन विशेशी!
आतिश तबहीं जिगर मिटेगी अगर मोहब्बत संग निभेगी!

याद पिआ नैंना भर आए माहिं जिगर दिल ख़्वाब सजाए!
आए दिल महबूबे हज़रत होइ मुक़म्मल दिल की हसरत!

मुझे नज़र फ़रहान देखियो लिखके ख़त ग़ुल्फ़ाम भेजियो!
वक्त जिहाद मुकम्मल होई रंज अलम ग़म जगत बिछोई

प्रियतम में निज खो जाऊॅंगी अमर प्रेम रस हो जाऊॅंगी!
होइ नहीं दरक़ार जगत की पहुचूंगी सरकार भगत की!

सत्य नाम निज दिल पर छाए पांच तत्व पोशाक़ हटाए!
पूरण प्रभु दीदार मिलत हैं मुरझाए दिल फ़ूल खिलत हैं!

हस्त निरन्जन लुट जाऊंगी जन्म मरण में जुट जाऊंगी!
रूह मयस्सर जगत करेगी शाह कभी मज़लूम बनेगी!

काल जगत में हरि को भूला अपयस में डोलत है फूला!
नहीं साथ में जाय अधेला दो दिन का है जगत झमेला!

डोरी मिलन टूट नहीं पाए भक्ति मयस्सर निज घर जाए!
आ जीवन यूं सुरति लगाले मोक्ष मुक्ति उपचार कराले!

रामहिं नाम जगत में पावन करतूतें तज थामहिं दामन!
सत्य गुरू सतनाम गहावै परम धाम तब राह दिखावै!

अगर इनायत होइ राम की करूॅं इब्तिदा परम धाम की!
हन्स परम रब हाथ गहेगा जीवन भर तब साथ रहेगा!

जोवत निस दिन राह तुम्हारी ख़वर कन्त अब लेउ हमारी!
युग मानिन्द गुजरतीं रीतियाॅं भर आईं दिल मेरी अंखियाॅं!

भरम जगत जन्जार जली हूॅं छोड़ महल उस पार चली हूॅं!
चश्म ग़मे वीरान जिगर है नहीं सजन नज़दीक किधर है!

 बरस पड़े रहमत है रब की हो फ़रहान दिले इस ढब की!
अक्षर परम दरश मिलते हैं निज घर तरफ़ सफ़र करते हैं!

हरि दीदार तपन दिल बुझती नीर मयस्सर प्यास विमुखती!
मिलता सुक्ख बहिस्त जियादा इख़्तियार शाग़िर्द इरादा!

सत गुरु पावन चरण बसेरा सुक्ख हयात मयस्सर डेरा!
शेय हरिक़ रस पान घनेरा परमेश्वर नहीं शान अंधेरा!

सत्य गुरू सत राह लखाई गा कर ग़ज़ल ज्ञान फ़रमाई!
ब्रह्मा विष्णु महेश जाल है ज्योति निरंजन पिदर काल है!


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