गुरू भगवान




नीरू पुत्र कबीर जुलाहे महिमा ख़ूब हबीब लुभाए! 

क्षर अक्षर अन्धेर हटाए कविता गाकर ज्ञान सुनाए!


राह मुक्ति जन नहीं समझते पाप पुन्य हैं वहीं उलझते!

डेरा ज्योति निरंजन जायें भव सागर में वापस आयें!


पूर्ण गुरू भगवान समाना करें अमर सतलोक पठाना!

है बीमारी जन्म मरण की करो बन्दना गुरू चरण की!


बन जाएँगे गुरू सहारा सुख सम्मति का दिखे नज़ारा!

होंइ गुरू नहीं राम मिलेंगे भूत पिशाच ग्रास कर लेंगे!


क्षर अक्षर का भरम तोड़ले गुरू प्रेम तू सहज जोड़ले!

गुरु से उत्तम नहीं जगत में तालमेल कर पूर्ण भगत में!


पूर्ण फ़ना तू मन को करके  होइ प्रवेश नैंन को भरके!

गुरु मक़्तव नहीं होइ निवासी रहे भटकता तू चौरासी!


हरियाने में सत हरि आए तत्व ज्ञान परि पूर्ण कराए!

क्षर से जो यजमान निडरते अमरपुरी स्थान पहुँचते!


हो आमीन मेरे गुरुवर को करें दाग़दा ब्रह्मादिक  को!

भक्ति महल दीदार नियारा क्षर अन्धेर हटे उजियारा!


सबके सदमों को हर लेते पलभर में नेमत कर देते!

जिनका जगत नहीं रखवारा उनका है गुरुदेव सहारा!


पूजा है बेक़ार निरन्जन नहीं दुखों का है ये भन्जन!

रूहों को निज जाल फँसाए पूरण मोक्ष नहीं दे पाए!


सत गुरु नाता जोड़ पियारे किए पाप पलभर में टारे!

ऐहतराम तू उजलत करले भव सागर से पार उतरले!


तुमहीं माता पिता तुम्हीं हो पूर्ण मेरे गुरुदेव तुम्हीं हो!

मेरी ख़ता माज़िरत कीजे भव से पार मोइ कर दीजे!


गुरुवर तुमको दास पुकारे करदो नाशक पाप हमारे!

लहर जहान सभी नश्वर हैं लखूँ जिधर मैं परमेश्वर हैं!


छोड़ा साथ रक़ीब ज़माना शम्मा जली उड़े परवाना!

एक झलक दीदार आस है रामपाल गोपाल दास है!


मूरति पूजा नहीं झमेला भक्त एक मैं हूं अलवेला!

मानवता मज़हब है मेरा ज़ावेदा सुख रहे घनेरा!


ग़ुर्वत बेशक़ चाहत अच्छी गाँव मेरा है नगला लच्छी!

गढ़ी कुँवरपुर पास बसेरा जनपद शहर हाथरस मेरा!

गुरू की झलक

एक झलक मैं देखके गुरू चरणँ में खोइ!

नय्या पार उतार दी जावेदा सुख होइ!


गुरू ज्ञान में डूबले मिट जाए मन मैल!

जीवन भी सुख में रहे मोक्ष मिलेगी गैल!


कभी न हिंसा कीजियो ओ प्राणी नादान!

जाइज़ बदला जानियो जीवन में आसान!


सही राह जो ले चले वही गुरू है पाक़!

ऐसा गुरू तलाश कर बच मिटने से खाक़!


कर्मों के इस लेख में ज्योति निरंजन हाथ!

नहीं मुक़म्मल कर सकै नहीं किसी के साथ!


क्षण क्षण जीवन बीतता प्राणी अब तो चेत!

काल बली सिर नाचता चुगने को ये खेत!


 आए चलि सतलोक से रखके रूप हक़ीर!

जाति जुलाहे घर पले सतगुरु पुरुष कबीर!


एक झलक दीदार की दीयो सतगुरु आन!

सदाँ मोहब्बत मैं करूँ दस्तियाब फ़रमान!


शेरी दिल भरपूर है करे जगत बदनाम!

 पहले था मैं पारखी पारख पी अब जाम!


करे मज़म्मत ये जहाँ सब है मुझे क़ुबूल!

फ़िर भी चाहूँ आपको है ये जिगर उसूल!


चाहे जगत हिक़ारतें परमेश्वर हो साथ!

दामन यूँ पकड़े रहूँ  कभी नँ  छूटे हाथ!

साधु संगति

चरणों शीस झुकायो री

सारा जगत भुलायो री

ख़त ज़न्नत से आ गया

मुझको राम बुलायो री!


हलचल दारुल हो रही

सजनी भी ख़ुश हो रही

सोलह ख़ूब सिंगार से

गरिमा सखी सजायो री

मुझको राम बुलायो री!


उजलत से वो चल दिए 

कर मेरा कर में लिए 

सदमा दिल होने लगा

साधू संग लुभायो री

मुझको राम बुलायो री!


ख़ुदा जीद बौछार है

हुआ ख़ूब ब्यौहार है

ज़ावेदा सुख हो गया

मैंने धरम कमायो री

मुझको राम बुलायो री!


जन्नत साधू साथ हो 

जैसे सिर रब हाथ हो

लक्ष्य यही पहुँचायेगा

अगर गुरू गुण गायो री

मुझको राम बुलायो री!



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