प्यार निभाया


1.दीदा दिलेरी निभाते गये!
अपना किसी को बनाते गये
दुनियाँ की रश्मों को तोड़ा तभी
उस पे ही सब कुछ लुटाते गये
दीदा दिलेरी निभाते गये!

2.घर में नहीं था सब्रे क़रार
होठों ख़मोशी नँ दिल में बहार
नाता ग़मों से ही जोड़े रखा
हँस कर के आँसू बहाते गये
दीदा दिलेरी निभाते गये!

3.ग़ुज़री हमेशाँ है रो रो उमर
उस पर नहीं है कोई असर
दिन रात दिल भी मचलते रहा
यादों के अरमाँ सताते गये
दीदा दिलेरी निभाते गये!

4.दिल शाद चेहरा सन्दल बदन,
ख़िल ही गया था दिल का चमन,
तश्ख़ीर हाँसिल कर नाँ सके,
तश्वीह से आज़माते गये,
दीदा दिलेरी निभाते गये,

5.मौसम बहारों के आते गये,
उल्फ़त के जामे उड़ाते गये,
परवाह बिल्कुल रही नाँ दिले,
इश्क़े वफ़ा यूँ लुटाते गये,
दीदा दिलेरी निभाते गये,


लड़ती है आँख आँख से लड़ती चली गई!
मेरी मोहब्बत दिन व दिन बढ़ती चली गई!
तक़्फ़ीफ है ग़म आलम दिल के शुक़ून का!
कोई हशीन मुझ पर मरती चली गई!

पाया है इश्क़ तेरा दीदार से सनम!
तेरा रहूँ मैं शाक़िर मुझको तेरी कसम!
तेरी मोहब्बत मैंने नीदें ख़राब कीं!
तेरी ये ज़ुल्फ़ हैराँ करती चली गई!
कोई हशीन मुझ पर मरती चली गई!

बैठे उदास घर में तेरी वफ़ा लिए!
सजदे भी तुझको मैंने कैई दफ़ा किए!
अब ग़ैर के बहाने आजा करीब़ तू!
ग़म चश्म अश्क़ इश्क़े भरती चली गई!
कोई हशीन मुझ पर मरती चली गई!

नादान था मैं पहले गलियों में घूमता!
यादों तेरी जाके दिल से मैं चूमता!
कसमें वफ़ा इरादे सब धूल में मिले!
वो दर किनोर लखके लखती चली गई!
कोई हशीन मुझ पर मरती चली गई!

फ़रहान दिल घनेरी जब तेरा साथ था!
 तब एक साथ बैठे हाथों में हाथ था!
छूटा है हाथ उसका जब से हमेश को!
ग़ैरों शिक़स्त खाके डरती चली गई!
कोई हशीन मुझ पर मरती चली गई!


1,
अपना किसी को शाकी चुन करके देखले!
अरजी किसी की यादों कर करके देखले!
2,
नेमत तुझे मिलेगी उल्फ़त के दौर में!2
अपना ख़ुदा हबीब तू कह करके देखले!
3,
दुश्वार है हयाते बेशक शुकून में!2
तौफ़ीक़ से शिक़स्तें सह करके देखले!
4,
बेताव हूँ ज़ियादा अपने हयात ग़म!2
क़ुर्वान सब किया है फ़ुरसत से देखले! 
5,
मज़धार इश्क़ मौजें लैहजा सुकून है!2
तूफ़ान ग़म से हाथों मल करके देखले!
6,
दर म्यान में ग़वाही परवर देग़ार के!2
महज़े यही तू बंदे कह  करके देखले!
7,
ऊँचा नहीं ज़मीरे हम राज़ भी नहीं!2
तहरीक़ रफ़्ता रफ़्ता कर करके देखले!
8,
ख़ुश होइगा ख़ुदा भी तुझ पर यक़ीन से!2
तू भी किसी की यादों मर करके देखले!
9,
क्या है शय मोहब्बत तुझको पता नहीं!2
आँखों में ग़म के आँसू भर भरके देखले!
10,
रब को ग़ुनाह तेरा हँस कर कुबूल हो!2
ले ले पनाह उसकी डर डरके देखले!


 यादों से क़वायत करते रहे गुज़ारा नहीं!
 रहेगी मोरब्बत मिल सका ख़ुदारा नहीं!

 ज़लील मत करो मुझे मैं तुम्हारा नहीं!
सब कुछ आपका है अब हमारा नहीं!

जाऊँ मैं  कहाँ पे  दिखता किनारा नहीं!
तेरे बिन  मुझे दुनियाँ भी ग़वारा नहीं!

दिखते हैं धूल सब   दिखता नजारा नहीं!
भूला मैं  क़यादत  समझा इशारा नहीं!

 बिछुड़ कर शाकी से दिखता शरारा नहीं!
भूल गया हमको वो कभी  सँवारा नहीं!

मेहरूम कर दिया उसने कभी पुकारा नहीं!
इश्क़ हुआ इसके बाद कभी दुवारा नहीं!


अपने बीते हुए लम्हात बताने वाले!
अब तो आजा मेरी आँखों में समाने वाले!
माँगा तुझे अल्लाह से मोहब्बत में!
मेरी उल्फ़त के चरागों को जलाने वाले!

यादों से तेरी रात बिताई मैंने!
दिलजान रिफ़ाक़त भी निभाई मैंने!
आँखों से मोहब्बत में अश्क़ गिरते हैं!
अब तो आजा मेरी हस्ती को मिटाने वाले!

बीते हुए लम्हात याद आते हैं!
रोकर कभी हँसकर के गीत गाते हैं!
मैं तो हक़ीर हूँ दिलदार मेरा शाक़ी हैं!
एवज में रिहायत से क़ैद दिलाने वाले!

उल्फ़त के घूँट पी रहा हूँ यादों में!
महफ़ूज रखना चाहता फ़रियादों में!
बाजार है बरवादियों उल्झन विवाद की!
हसरत को मेरी मन्जधार डुबाने वाले!


तेरी इबादत फ़ितूर बनके मेरे तसब्बुर महक रही है!
टहनी शजर बैठकर चिड़िया मधुर शुरों में चहक रही है!

होठ रशीले नैंन शरवती मेरे कोई जिगर उतरती!
धीरे धीरे तेरी चुनरिया तेरे बदन से सरक रही है!

रह रह करके याद सताती कभी हँसाती कभी रुलाती!
तेरे हवाले मेरी ज़िन्दगी बूँद आँख से झलक रही है!

आहें तेरी क़ैद शिश्कियाँ बाहर भीतर घर के दरमियाँ!
नहीं इक़्तिज़ा जहान कोई तेरी दिल में क़लक रही है!

ज़रा निभा दे साथ साथिया अपनाना मत कोई वाकिया!
आय बहार जलाली यौवन दिले मुहब्बत तड़फ रही है!

तेरा दीदार जब से मिला दिल दरपन भी तब से ख़िला!
जब नज़रों से नज़रें मिलीं हुआ उल्फ़त में ये मुख़्तिला!

तेरी सूरत नज़र का शमा मेरे दिल में उतरने लगी
मैं मुश्ताक़ तुझ पर हुआ मेरी चाहत बहकने लगी
अब यारी का अब यारी का है शिल्सिला
हुआ उल्फ़त में ये मुख़्तिला!

तेरी हैरत में ऐसे जिए पर तू तो मिला ही नहीं
मेरे जीवन में काँटे मिले फ़ूल बनके ख़िला ही नहीं
दिन बीते हैं दिन बीते हैं ग़म से मिला
हुआ उल्फ़त में ये मुख़्तिला!

तेरी प्यारी ये तिरछी नज़र ख़ूब सूरत मुझे भा गई 
 उड़े ज़ुल्फ़ों की बदली मेरे दिल बनके क़हर छा गई 
अब आ करके अब आ करके साहस दिला
हुआ उल्फ़त में ये मुख़्तिला!

तेरा चेहरा है दिल बीच में निज ग़म से रिझाऊँ तुझे
तू लिख करके ख़त भेज दे घर अपने मैं लाऊँ तुझे
तेरी नज़रों से तेरी नज़रों से जादू चला
हुआ उल्फ़त में ये मुख़्तिला!


बदले मोहब्बत मिली है ज़फ़ा 
यारी निभाई नहीं बे वफ़ा!

आ भी जा मेरी बाहें परेशान हैं
तुझको आग़ोश लेने पशेमान हैं
प्यार कर लूँ तुझे मैं नहीं हो ख़फ़ा
यारी निभाई नहीं बे वफ़ा!

राज़े उल्फ़त की बातें सभी याद हैं
साथ में दिन बिताए सभी याद हैं
देखता ही रहूँ तुझको जी भर दफ़ा
यारी निभाई नहीं बे वफ़ा!

कारवाँ इश्क़ का यूँ हीं चलता रहे
पास आने का आदेश मिलता रहे
डाल दे आज दामन में इतनी रफ़ा
यारी निभाई नहीं बे वफ़ा!

मेरी जबसे नज़र ये तुझे झाँकती
क़ामयाबी हदों का भरम लाँघती
है ज़माने की ग़र्दिश नहीं फ़ल्सफ़ा
यारी निभाई नहीं बे वफ़ा!


तेरी याद कर करके बे ख़ुद हुआ है
 रस्मों से दुनियाँ की बे सुद हुआ है
शुक़ूँ मेरे दिल को कहीं भी नहीं है
प्यासा मोहब्बत का बे ज़र हुआ है!

तेरा नूर दिल में उतरने लगा है
मेरा दिल भी कब से बहकने लगा है
ग़नीमत निभाई निभायेंगे हर पल 
तेरे इश्क़ का ये असर जो हुआ है
प्यासा मोहब्बत का बे ज़र हुआ है!

कहीं भी रहे तेरे दिल में रहूँगा
ज़माने की मुश्क़िल मैं हँसके सहूँगा
तेरा नाम लेकरके दम टूट जाये भी
उल्फ़त का फ़ज़्ले करम जो हुआ है
प्यासा मोहब्बत का बे ज़र हुआ है!

दुनियाँ फ़सादों से लवरेज़ हूँ मैं
वस्ले मोहब्बत की इक सेज़ हूँ मैं
मुझको नहीं ग़म है ज़ुल्मो सितम का
 मुझ पे नँ नाज़िल  क़हर तो हुआ है
प्यासा मोहब्बत का बे ज़र हुआ है!

नहीं मेरे नज़दीक मेरा सनम है
इसी बात का मुझको बेहद ही ग़म है
लख़ने चला ग़म की दुनियाँ में उसको
कहीं नाँ मयस्सर भरम तो हुआ है
प्यासा मोहब्बत का बे ज़र हुआ है!







तुझ पर दिलोजान से मरता हूँ मैं
देखकर तुझकोकभी सहमता हूँ मैं
परेशान हूँ मैं इसी हालत को लेकर 
ख़्वाबों में तेरे जानेमन सिमटता हूँ मैं!

मजबूरियाँ मेरी दोस्त बन गई हैं
अब छुरियाँ दिल पर चल गई हैं
 तैयार हूँ ज़माने से करने को ज़िहाद
लिहाज़ा ग़ुस्से में रात दिन दहकता हूँ मैं!

मायूस होने लगा हूँ मैं याद में तेरी
दिल परेशान है मेरा फरियाद में तेरी
हुई है मयस्सर बेताबी तन्हाई में मुझे
हो कर ग़मग़ीन इधर-उधर भटकता हूँ मैं!

फूल ज़िन्दगी में कभी खिले ही नहीं
हम तुम दोस्त कभी मिले ही नहीं
अंगारों की शैर कर रहा हूँ तश्लीम 
कोई कुछ कहे उस पे अकड़ पड़ता हूँ मैं!

क़शिश खींचकर ले गई मुक़ाम पर
एक हशीन मोहब्बत के जाम पर
छोड़ दिया है साथ तक़दीर ने मेरा
कभी गिरता हूँ तो कभी सम्हलता हूँ मैं!


चलता चला हूँ इश्क़े डगर 
मुझको नहीं थी कोई ख़बर!

दुश्मन ज़माना है मेरे लिए
भटका दिया मैं दर से बदर!

ग़ैरों से इनकार करना नहीं
बरसेगा तुझ पे रब का क़हर!

तुझ पे इलाही निग़ेवान हो
चाहे रक़ीबों से करना ग़दर!

हिज्रे मोहब्बत जता दे ज़रा
करना तू इतनी मुझ पे क़दर!

पाने की तुझको ली है क़सम 
छाया है तेरा ही मुझ पे अशर!

दिल को क़रारी मिलती रहे
दीदा दिलेरी है शामे फ़जर!

मेहफ़िल हशीनों की सजती रही
मज़नूँ समझ के हँसता शहर!

दो बूँद अश्क़ों इश्क़े शमाँ
पाया ग़मे दिल करके सफ़र!

मुझको भुलाके चला ही गया
मेरी किसी से लड़ती नज़र!

आया नहीं है नज़दीक वो
वीराँ तसब्बुर वीरान घर!

दीदार को दिल तड़फ़े मेरा
अश्क़ों की धारा है बीते पहर!



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