शरण कबीर की


शरण कबीर की

Author

Gopal Singh

Mo,6398347628


राम कबीरा ख़ालिक है!

सबके दिल का मालिक है!


अगर शरणँ में आओगे!

नेमत पूरणँ पाओगे!


क्षण क्षण जीवन बीत रहा!

काल शाँस को जीत रहा!


उपाय मुक्ति जलदी करले!

स्वाशों का सुमिरन करले!


आना जाना लगा रहे!

जीवन में ये सदाँ रहे!


जीवन को मत धूल कर!

सच्चा राम कुबूल कर!


लक्ष्मी घर के द्वार हो!

दौलत भी असरार हो!


सदमा घर से छार हो!

सुखी तेरा परिवार हो!


अपना रुतवा आप कर!

जीवन में मत पाप कर!


रब की दिल तासीर हो!

कदमों में जाग़ीर हो!


मोक्ष तुझे मिल जायेगा!

सदाँ अमर हो जायेगा!


अब तक नीदें सो रहा!

अपना आपा खो रहा!


जग से मती रिझाई कर!

पूरणँ राम कमाई कर!


मदिरा सेवन नाँ करो!

माँसा भक्षण नाँ करो!


जिवह जीव को नाँ करो!

गमन रकाशा नाँ करो!


सभी पाप के लक्षण हैैं!

ज्योति निरंजन भक्षण हैं!


शास्त्र नुकूल भक्ति को कर!

पूरणँ प्राप्त मुक्ति को कर!


दुनियाँ रह कर नाम कर!

ख़ुद को मत बदनाम कर!


सबक़ भक्ति से सीख रे!

दौलत पर मत रीझ रे!


बिरला जग में होइ ले!

भक्ति बोझ को ढोइ ले!


लावै मत दिल सुस्ती रे!

मिल जायेगी मुक्ती रे!


सच्चे दिल अरमान कर!

सब पर तू ऐहसान कर!


सुखी तेरा परिवार हो!

सत्य लोक रिजवान हो!


सच्चे गुण रब गायेगा!

कभी नँ जग में आयेगा!


दिल का जो भी शादिक़ है!

उस पर ही रब राजिक़ है!

कबीर की शरण

प्रभु जी मेरे कबीर हैं!

सबकी हरते पीर हैं!


पाक़ इल्म मिस्मार हुआ!

जीवन भी दुष्वार हुआ!


ज्ञान डगर पे चल आया!

दुनियाँ फंद निकल आया!


ये अरदाश मेरी सुनलो!

अपना शिष्य मुझे चुनलो!


भटक भटक दर पे आया!

आँखों तल रेहबर पाया!


और नहीं दिल माज़रा!

मिलन मेहज है आसरा!


कोई नँ मजहब जात है!

अलहद यही बिसात है!


सच्चे रब रेहमान तुम!

सत्य लोक रिजवान तुम!


इल्म समर दरवेश हो!

कणँ,कणँ करत प्रवेश हो!


दिखते एक फ़कीर हैं!

दिल के बहुत अमीर हैं!

गुरू अपनाया

गरु देव इनायत करदो तुम!

रँग मेरी किशमत भरदो तुम!


मेरी नैया धारे डूब रही!

जैहमत  अब तक ख़ूब शही!


अब कोई नँ और किनाराहै!

हिक़मत का मुझे सहारा है!


मन ज्योति निरंजन दूर हुआ!

जग पाक़ इल्म मशहूर हुआ!


कणँ कणँ में फ़जल बरसती है!

हरि  मिलने  रूह तरसती है!


शह धर्मी गुरु को अपनाया!

जिन काल फ़न्द से छुड़वाया!


अपना सिर गुरु चरणों रखता!

जिन पर सब न्यौछावर करता!


तुम ज़िल्लत जग में सहते हो!

निज हिक़मत बेहतर कहते हो!


निज धन्य धन्य गुरू देव तुम्हें!

समझा है अपना शिष्य हमें!


निज कैद सख़ावत करलो तुम!

दुनियाँ में हुरमत करदो तुम!

गुरू की शरण

सह धर्मी गुरु देव (2)

भँवर में नैया मेरी!

शरणँ में आया तेरी!


भले बुरे के मीत तुम्हीं हितकारी हो!

सुनलो करूणँ पुकार जगत गिरधारी हो!

तिर देवों के देव (2)

लगाई ज्यादा देरी!

शरणँ में आया तेरी!


गिरा हुआ हूँ भक्ति जगत तकरीर में!

बतलादे क्या होइ मेरी तक़दीर में!

जानत मन का भेव (2)

हरो तुम बाधा मेरी!

शरणँ में आया तेरी!


 ब्रह्म कैद में पड़े रहे अज्ञान से!

नेमत सच्ची मिली नहीं भगवान से!

बना नँ किश्ती खेव (2)

जिसे दिल माना शेरी!

शरणँ में आया तेरी!


हरि तशलीमे मौज अँधेरा दूर हुआ!

गुरू द्वारा रब ज्ञान दिले भरपूर हुआ!

पिला दिया है शेय (2)

प्रभू की गाथा टेरी!

शरणँ में आया तेरी!

सत् साहेब कबीर

मोहलत हाँशिल काल फंद से सुन गुरू की तक़रीर!

बार बार है शजदा तुमको सत् साहेब कबीर!

निजाते राह लखाई इनायत गुरु की छाई!


संकट सबके पल में साहेब तुम्हीं तो हर लेते!

सुख के सागर तुम्हीं हो सबको रैहमत देते!

मिला किनारा मेहज मुक्ति का नीरु पुत्र कबीर!

निजाते राह लखाई इनायत गुरु की छाई!


ब्रह्मा विष्णु महेश देव का इल्म जगत फ़रमाया!

 गीता ज्ञान वेद को गुरूजी ने पढ़ कर समझाया! 

 सारनाम सतनाम यही हैं मोहलत जग तदबीर!

निजाते राह लखाई इनायत गुरु की छाई!


दो आखर का सुमिरन बंदे स्वासों की गति कीयो!

सभी मजहबे जाति का ऐहतराम दिल कीयो!

मिलै अमानत अमर लोक में छूटै तभी शरीर!

निजाते राह लखाई इनायत गुरु की छाई


सत्य गुरू के  नाम बिना तू मुक्ति कभी नहीं पावै!

इसी  निरंजन लोक में जन्म मरण रम जावै!

सत्य गुरु तक़नीक उभरले  मत करना तक़सीर!

निजाते राह लखाई इनायत गुरु की छाई!

कबीर सबके हमराज़

हमराज इक तुम्हीं हो सत् लोक के निवासी!

हिक़मत को सही गहाने आये कबीर कासी!


बेहतर था बोल बाला  नफ़रत भी दिल नहीं थी!

सत् संग दिन बिताते आदिल हिए रूची थी!


लाखों का शिष्य लश्कर माया थी उनकी दासी!

हिक़मत को सही गहाने आये कबीर कासी! 


सत् सँग से जो कबीरा बेहतर था इल्म सीखा!

तक़नीके करी नँ हाँसिल ऐसा था ये तरीका!


सत् सँग से सत्य जाना अखियाँ निजात प्यासी!

हिक़मत को सही गहाने आये कबीर कासी!


मजहब को एक समझा जग प्रीत को जताया!

परमेश्वर पूर्णं शजदा सत् उपदेश भी गहाया!


 फ़ैहराया बुलन्द परचम मेहरम की फ़रीन रासी!

हिक़मत को सही गहाने आये कबीर कासी!


 मजहब से जिहादे जितने तक़सीर को मिटाया!

इक राम की इबादत सत् इल्म को जताया!


निज रखना दिले इनायत उजलत घृणा निकासी!

हिक़मत को सही गहाने आये कबीर कासी!

राम नाम को भज

अधवर डूबी नैया तेरी इक छिन पार उतर जाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


दुनियाँ रह अभिमान किया है अब काहे को पछताये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


सोचा नहीं तनिक भी दिल में काल आय मुझको खाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


किया नहीं उपकार जिन्दगी तुझपर को अब कर जाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


करै मुख़ातिब दौलत इशरत यहीं पड़ी सब रह जाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


बना नहीं तू शादरीन जब महलन  बरक़त रह जाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


माना सब कुछ सम्पति को ही जुदा राम से कर पाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!


वक्त अभी है सोच समझले अवसर नहीं फिर मिल पाये!

भजले बंदे राम नाम को भँवर बीच से तर जाये!

तारण हार सत् गुरू

सबके हाफ़िज तारणहार हरी हरियाने आए हैं!

दुनियाँ ज्योति निरंजन जाल फंद छुड़वाने आए हैं!

सबके हाफ़िज तारणहार हरी हरियाने आए हैं!


वेद शास्त्र का ज्ञान गुरु सिखलाइ दिया!

 पूर्णं राम है कौन जगत दिखलाइ दिया!

करी मेहर गुरू देव काल के फंद छुड़ाए हैं!

सबके हाफ़िज तारणहार हरी हरियाने आए हैं!


पूरणँ रब कौन जगत को बोल दिया!

पाक़ इल्म अनमोल खजाना खोल दिया!

वही सार है मुुक्ति नहीं तिर देव कहाए हैं!

सबके हाफ़िज तारणहार हरी हरियाने आए हैं!


ज्ञान ज़िहाद बन गया जिल्लत सहते हैं!

फिर भी सबसे सत्य वचन को कहते हैं!

सार नाम सत् नाम जगत उपदेश गहाए हैं!

सबके हाफ़िज तारणहार हरी हरियाने आये हैं!


शरण गुरु की आय फ़िक्र दिल मिट जाये बंदे!

सही राह पर चलै गलत से हट जाये अंधे!

मोहलत जग मिल जाइ पाक़ तक़नीक सिखाए हैं!

सबके हाफ़िज तारणहार हरी हरियाने आये हैं!

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